संदेश

Know why not to intermarry according to Sanatan Dharma ? लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जानिए सनातन धर्म के अनुसार अन्तर्जातीय विवाह क्यों नहीं करना चाहिए ?

चित्र
श्रीमद्भगवद् गीता   में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है - स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्ण संकरः ।  संकरो नरकायैवं कुलहनानां कुलस्य च   ।  अर्थात् स्त्रियों के व्यभिचारिणी होने पर वर्णसंकर सन्तान उत्पन्न होती है । यह वर्ण संकर संतान कुल का नाश करने वाली एवं समस्त कुल के लिए नरक का मार्ग प्रशस्त करने वाली होती है । वर्णसंकर संतान श्राद्धादि कर्म की अधिकारी न होने के कारण पिण्ड - तर्पण आदि न करने से पितर तृप्त नहीं होते । इस प्रकार मनुष्य के दोनों लोक बिगड़ जाते हैं । जैसे आम आदि वृक्षों में दूसरी जाति के पौधों की कलम लगाने पर उनसे प्राप्त फूल विभिन्न होते हैं । किन्तु इस प्रकार से तैयार किए गए वृक्ष में दूसरे वृक्ष उगा सकने की सामर्थ्य नहीं रहती । इस प्रकार कलम द्वारा तैयार वृक्ष नष्ट होने के साथ ही अपनी प्रगति को भी नष्ट कर देते हैं । जिस देश में वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होने लगेगी , उस देश का गौरव उसकी राष्ट्रीयता खतरे में पड़ जाएगी । यही कारण है कि विजातीय , असवर्ण विवाह पद्धति को सनातन धर्म ने मान्यता प्रदान नहीं की ।  इत...